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  • मैंने धन नहीं, ईश्वर को चुना

    मैंने धन नहीं, ईश्वर को चुना – मेरी साधना यात्रा
    मनुष्य इस संसार में अनेक इच्छाओं के साथ जन्म लेता है। कोई धन, दौलत, वैभव, सत्ता और प्रसिद्धि चाहता है। लेकिन मेरे जीवन का लक्ष्य इन सबसे अलग था। मेरे हृदय में बचपन से ही केवल एक प्रश्न जलता रहा—”इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का वास्तविक स्वामी कौन है?” और उसी प्रश्न ने मेरे पूरे जीवन की दिशा बदल दी।
    लगभग 14 वर्ष की आयु से मैंने स्वयं को साधना, तप, ध्यान, जप, मौन और आत्मचिंतन के मार्ग पर समर्पित कर दिया। मैंने केवल इसलिए किसी बात को सत्य नहीं माना कि वह किसी धर्मग्रंथ, पुस्तक या किसी व्यक्ति ने कही है। मेरा विश्वास सबसे पहले मेरी अंतरात्मा, मेरी भक्ति, मेरे अनुभव और मेरी साधना पर रहा।
    मेरा लक्ष्य किसी देवी-देवता की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि ब्रह्मांड के परम स्वामी को जानना था। मैं उस परम सत्य तक पहुँचना चाहती थी, जहाँ सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभूति शेष रह जाती है।
    यह मार्ग बिल्कुल भी सरल नहीं था। इसमें त्याग था, संघर्ष था, अकेलापन था, मौन था, अश्रु थे और वर्षों का तप था। लेकिन मेरे भीतर केवल एक ही संकल्प था—ईश्वर को जानना, केवल उनके बारे में सुनना नहीं।
    मेरी साधना यात्रा में वर्ष 2018 मेरे जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। मेरी व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभूति के अनुसार, उसी समय मुझे वह अनुभव प्राप्त हुआ जिसने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। उसके बाद भी मेरी साधना निरंतर चलती रही। मेरी अनुभूति के अनुसार, 2025 तक मुझे ब्रह्मांड, चेतना और आध्यात्मिक रहस्यों को पहले से अधिक गहराई से समझने का अवसर मिला।
    इस सम्पूर्ण यात्रा में मैंने लगभग 5 वर्ष क्रियायोग साधनाओं को गहराई से समझने और अभ्यास करने में लगाए तथा लगभग 9 वर्ष तंत्रयोग, ध्यान और तांत्रिक साधनाओं के अध्ययन, अभ्यास और अनुभव में समर्पित किए। मेरे लिए यह केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि स्वयं को बदलने और आत्मबोध की यात्रा थी।
    मेरे जीवन में एक ऐसा भी क्षण आया जब मानो मुझे दो मार्गों में से एक चुनना था। एक ओर था बेशुमार धन, दौलत, वैभव और संसार का आकर्षण, और दूसरी ओर था ईश्वर।
    मैंने बिना किसी संकोच के ईश्वर को चुना।
    आज यदि मेरे पास संसार का अपार धन नहीं है, तो मुझे उसका कोई दुःख नहीं है। क्योंकि मैंने जो पाया है, वह किसी भी भौतिक संपत्ति से अधिक मूल्यवान है। धन जीवन की सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन आत्मिक शांति, ईश्वर का सान्निध्य और आत्मज्ञान नहीं दे सकता।
    मैंने ईश्वर को केवल अपना हृदय नहीं दिया,
    मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
    हर साँस में उनका स्मरण है।
    हर कर्म में उनकी प्रेरणा है।
    हर दिन उनकी कृपा का अनुभव है।
    और हर क्षण उनका आशीर्वाद।
    यह केवल भक्ति नहीं…
    यह पूर्ण समर्पण है।
    मैंने संसार से कभी कुछ माँगने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि मेरा विश्वास था कि जिसने स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर दिया, उसके जीवन की व्यवस्था स्वयं ईश्वर करते हैं।
    आज मैं जो भी दिव्य ज्ञान, क्रियायोग, तंत्रयोग, ध्यान, साधना और आध्यात्मिक मार्गदर्शन साझा करती हूँ, वह मेरे अपने अभ्यास और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों की समझ पर आधारित है। मेरा उद्देश्य किसी पर अपने अनुभव थोपना नहीं है, बल्कि उन साधकों का मार्गदर्शन करना है जो सत्य की खोज में ईमानदारी से आगे बढ़ना चाहते हैं।
    यदि आपके भीतर भी यह प्रश्न उठता है कि—
    मैं कौन हूँ?
    जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
    क्या ईश्वर का अनुभव संभव है?
    क्या साधना वास्तव में जीवन को बदल सकती है?
    तो संभव है कि आपकी यात्रा भी अब आरम्भ होने के लिए तैयार हो।
    मैं मानती हूँ कि सच्चा गुरु वह नहीं जो केवल ज्ञान सुनाए, बल्कि वह है जो साधक को स्वयं अपने भीतर उतरने की प्रेरणा दे।
    मेरे लिए क्रियायोग केवल एक अभ्यास नहीं है, बल्कि चेतना को जागृत करने का विज्ञान है।
    तंत्रयोग मेरे लिए केवल रहस्य नहीं, बल्कि ऊर्जा, संतुलन और आत्मिक परिवर्तन का मार्ग है।
    और ध्यान केवल आँखें बंद करना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया है।
    यदि आप भी क्रियायोग, तंत्रयोग, ध्यान, मंत्र साधना तथा आध्यात्मिक जीवन को गंभीरता से सीखना और समझना चाहते हैं, तो आप मुझसे जुड़कर मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
    मेरा उद्देश्य प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि अधिक से अधिक लोगों तक आध्यात्मिक ज्ञान, साधना और आत्मजागरण का प्रकाश पहुँचाना है।
    मैंने धन नहीं चुना… मैंने ईश्वर को चुना।
    और आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी सम्पत्ति, यही सबसे बड़ा आशीर्वाद, और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
    यदि आपकी आत्मा भी उसी परम सत्य की खोज में है, तो इस दिव्य यात्रा में आपका हृदय से स्वागत है।
    ॥ ॐ तत्सत् ॥ 🙏

    sadhan

  • कलियुग में मानवता, आध्यात्मिक जागरण, साधना, ध्यान और ईश्वर भक्ति के महत्व पर आधारित प्रेरणादायक संदेश। जानें कैसे प्रेम, करुणा और आध्यात्मिकता से विश्व को बेहतर बनाया जा सकता है।

    कलियुग की रक्षा और मानवता का आह्वान
    प्राचीन काल से ही मानव की सबसे बड़ी खोज ईश्वर और सत्य की रही है। सत्ययुग में ईश्वर की अनुभूति और सत्य का प्रकाश प्रकट हुआ। त्रेतायुग में ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और महान साधकों ने कठोर तप एवं साधना के द्वारा आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त किया, वहीं असुरों ने भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य का विकास किया।
    द्वापरयुग में सृष्टि के समस्त चर-अचर प्राणियों के बीच संबंध, प्रेम, सम्मान और जीवन के रहस्यों की गहरी समझ विकसित हुई। मानव ने यह जानना प्रारंभ किया कि सृष्टि की उत्पत्ति और जीवन का प्रवाह एक दिव्य तांत्रिक एवं प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है।
    कलियुग में पूजा, पाठ, हवन, जप, तप और साधना को विशेष महत्व दिया गया, क्योंकि यही साधन मानव को ईश्वर से जोड़ते हैं। किंतु आज का मनुष्य आध्यात्मिकता से दूर होकर भौतिक आकर्षणों और दिखावे की दुनिया में अधिक उलझता जा रहा है। लोग अपने लिए भव्य भवन तो बना लेते हैं, परंतु अपने भीतर श्रद्धा, प्रेम, करुणा और दिव्यता का मंदिर बनाने का प्रयास कम करते हैं। परिवारों में सम्मान, प्रेम और आपसी आदर भी धीरे-धीरे कम होता दिखाई देता है।
    यदि संसार में पुनः साधना, पूजा, हवन, ध्यान और आध्यात्मिक जागृति का विस्तार होगा, तभी मानवता का कल्याण संभव होगा। हमारा कलियुग भी ईश्वर की ही एक अद्भुत रचना है। इसे विनाश की ओर नहीं, बल्कि प्रकाश और जागरण की ओर ले जाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
    आइए, हम सब मिलकर ब्रह्मांड के स्वामी, परम प्रकृति स्वरूप ईश्वर से प्रार्थना करें कि यह संसार सदैव सुंदर, संतुलित और कल्याणकारी बना रहे। वही सृष्टि के रचयिता हैं और वही इसके पालनकर्ता भी हैं।
    मैं, रेखा पांडे, मानवता के कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और मार्गदर्शन के उद्देश्य से आप सभी तक यह संदेश पहुँचा रही हूँ। यदि आप जीवन में सही दिशा, आत्मिक सुरक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की खोज में हैं, तो इस दिव्य यात्रा में जुड़ सकते हैं।
    संसार किसी एक व्यक्ति से सुंदर नहीं बनता, बल्कि हम सबके प्रेम, सहयोग, सद्भाव और जागरूकता से सुंदर बनता है।
    आइए, मिलकर एक जागृत, शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध विश्व का निर्माण करें।
    — रेखा पांडे

    🌺 दिव्य ज्ञान एवं साधना मार्गदर्शन 🌺
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  • Exploring Mindfulness: A Path to Personal Growth

    Understanding Mindfulness

    Mindfulness is the practice of being present in the moment, paying attention to thoughts and feelings without judgment. This essential spiritual practice encourages individuals to engage with the world fully, noticing the beauty and complexity of life as it unfolds. By focusing on the here and now, we can cultivate a deeper sense of awareness that enhances our personal growth journey.

    The Benefits of Meditation

    Meditation, a cornerstone of mindfulness, offers numerous benefits that can lead to spiritual and emotional well-being. Regular meditation practice helps reduce stress, improve concentration, and foster a greater sense of peace. By dedicating time to quiet our minds, we open ourselves up to insights that can transform our everyday experiences and promote lasting personal growth.

    Sharing Reflections with Community

    As we delve into spiritual topics like mindfulness and meditation, sharing our reflections with a community can be invaluable. Engaging with others in discussions about personal experiences and insights encourages deeper understanding and growth. Whether through daily blog posts, thematic discussions, or archived entries, cultivating a community where individuals can share their thoughts enhances our shared spiritual journey.

  • Exploring Mindfulness: The Path to Personal Growth

    Understanding Mindfulness

    Mindfulness is the practice of being fully present in the moment, paying attention to our thoughts, feelings, and bodily sensations without judgment. Developing a mindfulness practice allows individuals to cultivate awareness and appreciate the small moments of life.

    Benefits of Daily Mindfulness

    Incorporating mindfulness into our daily routine can lead to significant personal growth. It enhances mental clarity, reduces stress, and promotes emotional stability. By focusing on the present, we can alleviate excessive worrying about the past or future, allowing ourselves the space to grow and evolve.

    Practicing Mindfulness in Everyday Life

    Practicing mindfulness does not require extensive training or special equipment. Simple techniques such as mindful breathing, meditation, or even mindful walking can be incorporated into your daily habits. These practices encourage reflection and provide an opportunity to connect with your inner self, fostering a deeper understanding of your thoughts and emotions.

  • बेला यक्षिणी — पवित्रता, सुगंध और दिव्य चेतना का रहस्य
    आठ गुप्त यक्षिणियों के दिव्य रहस्यों के पश्चात, नवम स्थान पर प्रकट होती हैं — बेला

    यक्षिणी, एक ऐसी सूक्ष्म दिव्य शक्ति जो सुगंध, पवित्रता, कोमलता और दिव्य स्त्री-ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।
    “बेला” केवल एक पुष्प का नाम नहीं है। यह उस अदृश्य सुगंध का प्रतीक है जो आत्मा के शुद्ध होने पर जीवन में फैलती है। जिस प्रकार बेला का पुष्प अपनी मधुर सुगंध से वातावरण को आनंदमय बना देता है, उसी प्रकार बेला यक्षिणी 🧚‍♀️की ऊर्जा साधक के अंतर्मन को शांति, प्रेम और सात्विकता 🧘‍♂️से भर देती है।


    बेला यक्षिणी कौन हैं?
    तांत्रिक और आध्यात्मिक परंपराओं में बेला यक्षिणी को शुद्ध ऊर्जा, सौंदर्य, मधुरता और सकारात्मक आभा की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में देखा जाता है। वे उस दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं जो मनुष्य के भीतर छिपी कोमलता, करुणा और प्रेम को जागृत करती है।
    जहाँ उनकी कृपा मानी जाती है, वहाँ मन की अशांति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है, वाणी में मधुरता आती है और व्यक्तित्व में ऐसा स्वाभाविक आकर्षण विकसित होता है जो बाहरी रूप से नहीं, बल्कि आंतरिक प्रकाश से उत्पन्न होता है।
    बेला यक्षिणी की दिव्य शक्तियाँ
    व्यक्तित्व में प्राकृतिक आकर्षण और सौम्यता का विकास
    मन की शांति तथा भावनात्मक संतुलन
    नकारात्मक विचारों और ऊर्जाओं का क्षय
    घर एवं वातावरण🌳 में सात्विकता और सकारात्मकता का विस्तार
    प्रेम, करुणा और मधुर व्यवहार का जागरण💑
    आभामंडल (Aura) को कोमल, उज्ज्वल और आकर्षक बनाना
    अंतर्मन में शुद्धता और दिव्यता की अनुभूति
    गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ
    बेला यक्षिणी का वास्तविक रहस्य किसी बाहरी सत्ता से अधिक, साधक के भीतर स्थित उस दिव्य गुण में छिपा है जो जीवन को सुगंधित बना देता है।
    वे हमें स्मरण कराती हैं कि—
    सच्ची सुगंध इत्र से नहीं, गुणों से आती है।
    सच्चा आकर्षण रूप से नहीं, आत्मा की पवित्रता से उत्पन्न होता है।
    सच्ची शक्ति नियंत्रण में नहीं, प्रेम और करुणा में निवास करती है।
    बेला यक्षिणी उस चेतना का प्रतीक हैं जहाँ हृदय की करुणा और सहस्रार की दिव्यता एक साथ खिल उठती है। उनका संदेश है कि मनुष्य ऐसा व्यक्तित्व विकसित करे जिसके निकट आकर लोग शांति, सुरक्षा और प्रेम का अनुभव करें।
    साधना के विषय में
    यक्षिणी साधनाएँ परंपरागत रूप से गूढ़ और तांत्रिक मानी गई हैं। इसलिए किसी भी गहन तांत्रिक अभ्यास को बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।
    स्वार्थ, वशीकरण, भौतिक लालसा या किसी पर प्रभाव स्थापित करने के उद्देश्य से की गई साधनाएँ आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग नहीं बनतीं।
    बेला यक्षिणी की ऊर्जा से जुड़ने का सबसे सुरक्षित और श्रेष्ठ मार्ग है—
    ध्यान
    भक्ति
    सात्विक जीवन
    शुद्ध विचार
    प्रेमपूर्ण आचरण
    सरल आध्यात्मिक उपासना
    प्रातःकाल या संध्या समय किसी स्वच्छ स्थान पर दीप प्रज्वलित करें। बेला अथवा कोई भी श्वेत पुष्प श्रद्धा से अर्पित करें। शांत मन से बैठकर अपने हृदय में प्रकाश की अनुभूति करें।


    फिर श्रद्धापूर्वक 108 बार जप करें:📿


    ॐ श्रीं बेलायै नमः।


    जप के समय यह भावना रखें—
    मेरे जीवन में पवित्रता, शांति, प्रेम और दिव्य सुगंध के समान सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार हो रहा है। मेरा हृदय करुणा से भर रहा है और मेरा जीवन ईश्वरीय प्रकाश का माध्यम बन रहा है।


    बेला — एक आंतरिक जागरण
    बेला यक्षिणी केवल एक आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि आत्मा की उस अवस्था का प्रतीक हैं जहाँ मनुष्य स्वयं सुगंध बन जाता है।
    जब विचार पवित्र हो जाते हैं,
    जब हृदय करुणा से भर जाता है,
    जब जीवन प्रेम का माध्यम बन जाता है,
    तब भीतर की बेला खिलती है।
    और तब व्यक्ति को बाहरी पहचान की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उसकी उपस्थिति ही शांति का संदेश बन जाती है।
    बेला स्वरूप
    यह केवल एक नाम नहीं है।
    यह उस चेतना का संकेत है जो पवित्रता बनकर खिलती है, प्रेम बनकर बहती है और शांति बनकर संसार को स्पर्श करती है।
    ब्रह्माण्ड की अनंत शक्तियों के मध्य, आत्मा जब अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है, तब वह जान लेती है कि दिव्यता कहीं बाहर नहीं, स्वयं उसके भीतर विद्यमान है।
    मैं वही सुगंध हूँ जो हृदयों को जोड़ती है।
    मैं वही शांति हूँ जो अशांत मन को विश्राम देती है।
    मैं वही प्रेम हूँ जो भेदों को मिटा देता है।
    मैं वही प्रकाश हूँ जो भीतर से प्रकट होता है।
    बेला — पवित्रता की सुगंध,
    प्रेम की मधुरता,
    और दिव्य चेतना का जीवंत स्पंदन। ✨🌸🙏🏻
    नोट: बेला यक्षिणी के संबंध में विभिन्न तांत्रिक परंपराओं में भिन्न-भिन्न मान्यताएँ मिलती हैं। उपर्युक्त विवरण आध्यात्मिक एवं प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत है।

    (more…)
  • बेला की दृष्टि से तांत्रिक साधनाओं का परमात्मा और आकर्षण का दिव्य रहस्य

    प्रभु अर्ध महा गणाधिपतिये जी।🔱


    मेरे आध्यात्मिक चिंतन में तांत्रिक साधनाओं का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान या सिद्धियों की प्राप्ति नहीं है। तंत्र का वास्तविक उद्देश्य चेतना के गहनतम स्तरों को समझना और परम सत्य की ओर अग्रसर होना है।
    बेला की दृष्टि में तांत्रिक साधनाओं के परमात्मा प्रभु अर्ध महा गणाधिपतिये जी हैं।
    मेरे चिंतन के अनुसार, प्रभु अर्ध महा गणाधिपतिये जी समस्त सृष्टि में व्याप्त आदिचेतना और दिव्य व्यवस्था के प्रतीक हैं। जिस प्रकार ब्रह्मांड अनगिनत शक्तियों, नियमों और ऊर्जाओं के संतुलन पर आधारित है, उसी प्रकार साधक के भीतर भी अनेक शक्तियाँ कार्य करती हैं।
    जब साधक अपने भीतर के भ्रम, भय और सीमाओं को पार करने का प्रयास करता है, तब वह उस दिव्य चेतना की ओर बढ़ता है जिसका प्रतीक मेरे लिए प्रभु अर्ध महा गणाधिपतिये जी हैं।
    मेरे चिंतन में वे केवल पूजनीय स्वरूप नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण के मार्गदर्शक भी हैं। उनका स्मरण साधक को स्थिरता, विवेक और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
    तांत्रिक साधना का पहला चरण स्वयं को जानना है, और स्वयं को जानने की यात्रा अंततः उसी दिव्य चेतना तक पहुँचती है जो समस्त अस्तित्व का आधार है।

    भाग 2
    बेला की दृष्टि से तांत्रिक साधनाओं का परमात्मा: प्रभु अर्ध भैरव त्रिपुर सुंदर जी।
    मेरे आध्यात्मिक चिंतन में प्रभु अर्ध भैरव त्रिपुर सुंदर जी दिव्य पुरुष चेतना, ज्ञान और शक्ति के प्रतीक हैं।
    संसार में अनेक प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं। कुछ शक्तियाँ सृजन करती हैं, कुछ संरक्षण करती हैं और कुछ परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती हैं। मेरे चिंतन में प्रभु अर्ध भैरव त्रिपुर सुंदर जी वह दिव्य स्वरूप हैं जो साधक को निर्भयता और आत्मबल प्रदान करते हैं।
    जब मनुष्य अपने भीतर छिपे भय, संशय और अज्ञान का सामना करता है, तब उसे एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता होती है जो उसे सत्य के मार्ग पर दृढ़ बनाए रखे। मेरे अनुसार यह प्रेरणा प्रभु अर्ध भैरव त्रिपुर सुंदर जी के चिंतन से प्राप्त होती है।
    वे साधक को यह स्मरण कराते हैं कि वास्तविक विजय बाहरी संसार पर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर स्थित अज्ञान पर प्राप्त की जाती है।
    तांत्रिक मार्ग में आत्मानुशासन, धैर्य और निरंतर साधना का अत्यंत महत्व है। जो साधक इन गुणों को विकसित करता है, वह धीरे-धीरे अपनी चेतना के उच्च स्तरों को अनुभव करने लगता है।
    मेरी दृष्टि में प्रभु अर्ध भैरव त्रिपुर सुंदर जी उसी जागृत चेतना के प्रतीक हैं।

    भाग 3
    बेला की दृष्टि से तांत्रिक साधनाओं का परमात्मा:

    अर्ध भैरवी त्रिपुर सुंदरी जी। 🌷
    मेरे आध्यात्मिक चिंतन में अर्ध भैरवी त्रिपुर सुंदरी जी प्रेम, करुणा, शक्ति और दिव्य मातृचेतना का स्वरूप हैं।
    सृष्टि केवल शक्ति से नहीं चलती, बल्कि करुणा और संतुलन से भी संचालित होती है। जहाँ शक्ति है, वहाँ प्रेम का होना आवश्यक है। जहाँ ज्ञान है, वहाँ करुणा का होना भी उतना ही आवश्यक है।
    मेरी दृष्टि में अर्ध भैरवी त्रिपुर सुंदरी जी उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक हैं जो साधक के हृदय को कोमलता, भक्ति और समर्पण से भर देती है।
    जब साधक अपने भीतर की चेतना को शुद्ध करने का प्रयास करता है, तब वह अनुभव करता है कि आध्यात्मिक यात्रा केवल ज्ञान की नहीं, बल्कि प्रेम की भी यात्रा है।
    अर्ध भैरवी त्रिपुर सुंदरी जी का चिंतन साधक को यह शिक्षा देता है कि वास्तविक शक्ति विनम्रता में है, वास्तविक सौंदर्य पवित्रता में है और वास्तविक दिव्यता प्रेम में है।
    मेरे अनुसार, तांत्रिक साधना का अंतिम उद्देश्य अपने भीतर स्थित चेतना और शक्ति को पहचानकर परमात्मा के प्रकाश से जुड़ना है।
    यही कारण है कि मेरे आध्यात्मिक चिंतन में अर्ध भैरवी त्रिपुर सुंदरी जी दिव्य प्रेम, अनंत करुणा और आत्मिक जागरण की प्रतीक हैं।