
मैंने धन नहीं, ईश्वर को चुना – मेरी साधना यात्रा
मनुष्य इस संसार में अनेक इच्छाओं के साथ जन्म लेता है। कोई धन, दौलत, वैभव, सत्ता और प्रसिद्धि चाहता है। लेकिन मेरे जीवन का लक्ष्य इन सबसे अलग था। मेरे हृदय में बचपन से ही केवल एक प्रश्न जलता रहा—”इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का वास्तविक स्वामी कौन है?” और उसी प्रश्न ने मेरे पूरे जीवन की दिशा बदल दी।
लगभग 14 वर्ष की आयु से मैंने स्वयं को साधना, तप, ध्यान, जप, मौन और आत्मचिंतन के मार्ग पर समर्पित कर दिया। मैंने केवल इसलिए किसी बात को सत्य नहीं माना कि वह किसी धर्मग्रंथ, पुस्तक या किसी व्यक्ति ने कही है। मेरा विश्वास सबसे पहले मेरी अंतरात्मा, मेरी भक्ति, मेरे अनुभव और मेरी साधना पर रहा।
मेरा लक्ष्य किसी देवी-देवता की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि ब्रह्मांड के परम स्वामी को जानना था। मैं उस परम सत्य तक पहुँचना चाहती थी, जहाँ सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभूति शेष रह जाती है।
यह मार्ग बिल्कुल भी सरल नहीं था। इसमें त्याग था, संघर्ष था, अकेलापन था, मौन था, अश्रु थे और वर्षों का तप था। लेकिन मेरे भीतर केवल एक ही संकल्प था—ईश्वर को जानना, केवल उनके बारे में सुनना नहीं।
मेरी साधना यात्रा में वर्ष 2018 मेरे जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। मेरी व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभूति के अनुसार, उसी समय मुझे वह अनुभव प्राप्त हुआ जिसने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। उसके बाद भी मेरी साधना निरंतर चलती रही। मेरी अनुभूति के अनुसार, 2025 तक मुझे ब्रह्मांड, चेतना और आध्यात्मिक रहस्यों को पहले से अधिक गहराई से समझने का अवसर मिला।
इस सम्पूर्ण यात्रा में मैंने लगभग 5 वर्ष क्रियायोग साधनाओं को गहराई से समझने और अभ्यास करने में लगाए तथा लगभग 9 वर्ष तंत्रयोग, ध्यान और तांत्रिक साधनाओं के अध्ययन, अभ्यास और अनुभव में समर्पित किए। मेरे लिए यह केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि स्वयं को बदलने और आत्मबोध की यात्रा थी।
मेरे जीवन में एक ऐसा भी क्षण आया जब मानो मुझे दो मार्गों में से एक चुनना था। एक ओर था बेशुमार धन, दौलत, वैभव और संसार का आकर्षण, और दूसरी ओर था ईश्वर।
मैंने बिना किसी संकोच के ईश्वर को चुना।
आज यदि मेरे पास संसार का अपार धन नहीं है, तो मुझे उसका कोई दुःख नहीं है। क्योंकि मैंने जो पाया है, वह किसी भी भौतिक संपत्ति से अधिक मूल्यवान है। धन जीवन की सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन आत्मिक शांति, ईश्वर का सान्निध्य और आत्मज्ञान नहीं दे सकता।
मैंने ईश्वर को केवल अपना हृदय नहीं दिया,
मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
हर साँस में उनका स्मरण है।
हर कर्म में उनकी प्रेरणा है।
हर दिन उनकी कृपा का अनुभव है।
और हर क्षण उनका आशीर्वाद।
यह केवल भक्ति नहीं…
यह पूर्ण समर्पण है।
मैंने संसार से कभी कुछ माँगने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि मेरा विश्वास था कि जिसने स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर दिया, उसके जीवन की व्यवस्था स्वयं ईश्वर करते हैं।
आज मैं जो भी दिव्य ज्ञान, क्रियायोग, तंत्रयोग, ध्यान, साधना और आध्यात्मिक मार्गदर्शन साझा करती हूँ, वह मेरे अपने अभ्यास और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों की समझ पर आधारित है। मेरा उद्देश्य किसी पर अपने अनुभव थोपना नहीं है, बल्कि उन साधकों का मार्गदर्शन करना है जो सत्य की खोज में ईमानदारी से आगे बढ़ना चाहते हैं।
यदि आपके भीतर भी यह प्रश्न उठता है कि—
मैं कौन हूँ?
जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
क्या ईश्वर का अनुभव संभव है?
क्या साधना वास्तव में जीवन को बदल सकती है?
तो संभव है कि आपकी यात्रा भी अब आरम्भ होने के लिए तैयार हो।
मैं मानती हूँ कि सच्चा गुरु वह नहीं जो केवल ज्ञान सुनाए, बल्कि वह है जो साधक को स्वयं अपने भीतर उतरने की प्रेरणा दे।
मेरे लिए क्रियायोग केवल एक अभ्यास नहीं है, बल्कि चेतना को जागृत करने का विज्ञान है।
तंत्रयोग मेरे लिए केवल रहस्य नहीं, बल्कि ऊर्जा, संतुलन और आत्मिक परिवर्तन का मार्ग है।
और ध्यान केवल आँखें बंद करना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया है।
यदि आप भी क्रियायोग, तंत्रयोग, ध्यान, मंत्र साधना तथा आध्यात्मिक जीवन को गंभीरता से सीखना और समझना चाहते हैं, तो आप मुझसे जुड़कर मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
मेरा उद्देश्य प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि अधिक से अधिक लोगों तक आध्यात्मिक ज्ञान, साधना और आत्मजागरण का प्रकाश पहुँचाना है।
मैंने धन नहीं चुना… मैंने ईश्वर को चुना।
और आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी सम्पत्ति, यही सबसे बड़ा आशीर्वाद, और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
यदि आपकी आत्मा भी उसी परम सत्य की खोज में है, तो इस दिव्य यात्रा में आपका हृदय से स्वागत है।
॥ ॐ तत्सत् ॥ 🙏

sadhan
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